शिव के स्वरूप और प्रतीक
शिवलिंग का महत्व
शिवलिंग भगवान शिव का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र प्रतीक चिन्ह है। ‘लिंग’ शब्द का संस्कृत में अर्थ ‘चिह्न’ या ‘प्रतीक’ होता है। यह शिव के निराकार (बिना किसी आकार के) और अनंत स्वरूप को दर्शाता है. शिवलिंग पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक है। यह उस ‘ब्रह्मांडीय अंडे’ (Cosmic Egg) को दर्शाता है जिससे सृष्टि की उत्पत्ति हुई और जिसमें अंततः सब विलीन हो जाता है. शिवलिंग के तीन हिस्से त्रिदेवों को दर्शाते हैं: निचला हिस्सा ब्रह्मा (सृजन), मध्य हिस्सा विष्णु (पालन) और ऊपरी हिस्सा शिव (संहार) का प्रतीक है.
त्रिशूल, डमरू और गंगा:
भगवान शिव के ये तीनों प्रतीक केवल आभूषण नहीं हैं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक संदेश समेटे हुए हैं.
त्रिशूल (Trishul): त्रिशूल महादेव का सबसे प्रमुख अस्त्र है, जो तीन शूलों (नुकीले सिरों) से बना है। यह जीवन के तीन प्रमुख आयामों के संतुलन को दर्शाता है.तीन गुण: यह सत (पवित्रता), रज (गति) और तम (जड़ता) के बीच संतुलन का प्रतीक है।
तीन अवस्थाएँ: यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति (गहरी नींद) की अवस्थाओं पर शिव के नियंत्रण को दर्शाता है।
कष्टों का नाश: त्रिशूल दैहिक, दैविक और भौतिक—तीनों प्रकार के तापों (दुखों) को नष्ट करने की शक्ति का प्रतीक है। त्रिशूल के अर्थ पर अधिक जानकारी यहां मिल सकती है.
डमरू (Damru): डमरू भगवान शिव का वाद्य यंत्र है, जो ब्रह्मांड की ध्वनि और लय का प्रतीक है.ब्रह्मांड का नाद: माना जाता है कि शिव के डमरू की ध्वनि (नाद ब्रह्म) से ही सृष्टि का सृजन हुआ है।
संस्कृत व्याकरण: मान्यता है कि डमरू के 14 बार बजने से माहेश्वर सूत्र निकले, जो संस्कृत भाषा का आधार बने.
शून्य और विस्तार: इसका आकार बताता है कि ब्रह्मांड एक बिंदु से फैल रहा है और पुनः उसी में समा जाएगा।